Rafiq Pasha

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इत्तिफ़ाक़

हमारा पहुँचना क़ब्रिस्तान महस था एक इत्तिफ़ाक़
देखा मुतवफफी लहद में लेटे थे छोड़कर आफ़ाक़

आसमान में डूबते सूरज कि बिखरती लाली ये कहे
परिंदे लौट आए अपने घोसले भूलकर सब निफाक़

चारो ओर उदासी छाई हूवी थी, चहरे थे फ़िक्री
जानेवालो कि सिफ्र रहजाएगी यादो के औराक़

करोना का अजीब दौर था जब मौत होगई थी सस्ती
सारी आवाम सब्र का घूँट पीकर, तस्लीम किए फ़िराक

मरज़ हो जाए ख़त्म ओर नया इलाज होग़ा ईजाद
तभी तो इन्सान पाएगा अमन और विफाक़
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