Sumit Maurya

September 3, 1984 - Earth

कविता ए ज़िन्दगी

के दिल में आया कि एक कविता लिखूं, कुछ ज़िन्दगी जैसी,
कुछ मोड़ लिखूं तेडे मेडे,
कुछ शब्द लिखूं तेरे मेरे,
कुछ दर्द लिखूं , कुछ मर्ज लिखूं
कुछ चाल लिखूं, क्या हाल लिखूं?
क्या हाल लिखूं अब अपना में
बेहाल हाल का मंज़र है,
शायद चुभता हुआ एक खंजर है।
एक दौढ़ जिसका मैं हिस्सा हूं,
कुछ मौज जिसका मैं किस्सा हूं,
एक जाम जिसका मैं साकी हूं,
वो शाम जिसका मैं साथी हूं,
वो किस्सा जिसका मैं रावी हूं
वो कमजोर जिसपे मैं हावी हूं,
कुछ लिखूं यहां में अपना सा
कुछ लिखूं यहां मैं सपना सा,
कुछ लिखूं अपना पराया सा
कुछ लिखूं कोई अपनाया सा,
क्या बायां करूं चिंता मेरी
या बायां करूं चिंता तेरी?
कुछ राग लिखूं
आलाप लिखूं
चंदन पे लिपटा सांप लिखूं।
या लिखूं अख़बार के पन्नों को
लथपथ खूनी सा तार लिखूं,
सरकार के हाथों पिसता मैं
हर ज़ख्म हज़ार बार लिखूं।
थक चूर हो गया अब तो मैं
तू ही बता क्या यार लिखूं,
क्या लिखूं तेरी मैं सच्चाई,
किस्मती खेल बेकार लिखूं
चल लगी शर्त अब लिखने की
तू मुझे लिखे में तुझे लिखूं।
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